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प्रदूषण मुक्त होंगे हिमालयी कचरा स्थल, 820 जीवाणुओं में तलाशे सफाई के ‘साथी’

वैज्ञानिकों ने हिमालयी क्षेत्रों में कचरा प्रदूषण से निपटने के लिए 820 जीवाणु उपभेदों की पहचान की है। ये जीवाणु जहरीले कचरे और भारी धातुओं को कम हानिकारक बना सकते हैं, जिन्हें अब कैप्सूल तकनीक से प्रदूषित स्थलों पर उपयोग किया जाएगा।

अल्मोड़ा। पहाड़ों में बढ़ते कचरा प्रदूषण से निपटने के लिए वैज्ञानिक अब जीवाणुओं की मदद लेने की तैयारी कर रहे हैं।

सोबन सिंह जीना परिसर के शोधकर्ताओं ने मुख्य शोध अन्वेषक और वर्तमान में कुमाऊं विवि के डीएसबी परिसर में तैनात डा. मुकेश सामंत के अगुआई में चल रहे अध्ययन में ऐसे जीवाणुओं की पहचान की है, जो कचरे में मौजूद जहरीले पदार्थों को कम हानिकारक बनाने में मदद कर सकते हैं।

शोध के अगले चरण में इन जीवाणुओं को छोटे जैविक कैप्सूल में सुरक्षित कर प्रदूषित मिट्टी और पानी की सफाई में इस्तेमाल करने की योजना है।

राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन के तहत वर्ष 2024 में डा. मुकेश सामंत को उत्तराखंड हिमालय के प्रदूषित क्षेत्रों के सुधार के लिए यह परियोजना मिली थी। शोध दल ने अल्मोड़ा के फलसिमा, हल्द्वानी, लालकुआं पेपर मिल, सितारगंज, रुद्रपुर और हरिद्वार के औद्योगिक क्षेत्रों से मिट्टी, पानी और कचरे के नमूने लिए।

कई महीनों तक प्रयोगशाला में जांच के बाद इन नमूनों से 820 अलग-अलग तरह के जीवाणु पाए गए। इनमें से कई जीवाणु भारी धातुओं, औद्योगिक रंगों और कीटनाशकों को तोड़ने में सक्षम मिले हैं। शोधकर्ताओं ने इन जीवाणुओं की पहचान उनके जीन की जांच के जरिए की।

रंगीन औद्योगिक पानी को साफ करने की क्षमता

शोध में स्टेनोट्रोफोमोनास माल्टोफिलिया नामक जीवाणु विशेष रूप से प्रभावी पाया गया। यह कुछ ऐसे प्राकृतिक पदार्थ बनाता है, जो जटिल और जहरीले रसायनों को छोटे और कम हानिकारक पदार्थों में बदलने में मदद करते हैं। प्रयोग में कांगो रेड, ब्रिलियंट ग्रीन और मेथिलीन ब्लू जैसे औद्योगिक रंगों को तोड़ने की क्षमता की जांच की गई।

शोध दल ने तांबा, निकेल, जस्ता, सीसा, मैंगनीज और पारे जैसी जहरीली धातुओं के बीच भी इन जीवाणुओं के व्यवहार की जांच की। सितारगंज के औद्योगिक पानी से मिले कुछ जीवाणु 650 पीपीएम से अधिक पारे की मात्रा में भी जीवित और सक्रिय पाए गए। इसके अलावा थियोमेथोक्सन, कार्बेन्डाजिम और क्लोरपाइरिफोस जैसे कीटनाशकों को तोड़ने की क्षमता वाले जीवाणुओं पर भी अध्ययन किया जा रहा है।

कैप्सूल में सुरक्षित रखे जाएंगे जीवाणु

शोध दल ने अलग-अलग प्रभावी जीवाणुओं को मिलाकर ऐसे समूह तैयार किए हैं, जो प्रदूषकों के उपचार में अधिक प्रभावी हो सकते हैं। अब इन्हें जैविक कैप्सूल में सुरक्षित रखने की तकनीक पर काम चल रहा है।

कैप्सूल के जरिए जीवाणुओं को प्रदूषित मिट्टी में नियंत्रित मात्रा में छोड़ा जा सकेगा। इससे उनकी प्रभावशीलता और उपयोग अवधि बढ़ाने में मदद मिलेगी। भविष्य में इस तकनीक का इस्तेमाल कचरा डंपिंग स्थलों, प्रदूषित जलधाराओं और औद्योगिक क्षेत्रों में प्रदूषण कम करने के लिए किया जा सकता है।

820 जीवाणुओं में तलाशे सफाई के ””साथी””

अल्मोड़ा समेत छह प्रदूषित स्थलों से लिए गए नमूनों में 820 अलग-अलग जीवाणु मिले। वैज्ञानिक अब इनमें से उन जीवाणुओं की पहचान कर रहे हैं, जो जहरीली धातुओं, औद्योगिक रंगों और कीटनाशकों को तोड़ने में सबसे अधिक प्रभावी हैं।

650 पीपीएम पारे में भी सक्रिय

सितारगंज के औद्योगिक पानी से मिले कुछ जीवाणु 650 पीपीएम से अधिक पारे की मात्रा में भी जीवित और सक्रिय पाए गए। वैज्ञानिकों के लिए यह महत्वपूर्ण परिणाम है, क्योंकि अब इन जीवाणुओं की मदद से अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों के उपचार की संभावनाओं का अध्ययन किया जा रहा है।

परियोजना का लक्ष्य विशिष्ट सूक्ष्म जीव समूहों का उपयोग करके, खतरनाक औद्योगिक और नगरपालिका अपशिष्ट को निष्क्रय करने जैव उपचार प्रौद्योगिकियां विकसित करना था। 2024 से यह परियोजना शुरू की थी। – डा. मुकेश सामंत, मुख्य शोध अन्वेषक।

 

 

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